फ़लस्तीन पर एक जैसा रुख़, लेकिन नेतन्याहू की जगह आइजनकोट क्यों बने अरब पार्टियों की पसंद

गादी आइज़नकोट और बिन्यामिन नेतन्याहू
इमेज कैप्शन, गादी आइज़नकोट के पक्ष में छह राजनीतिक दलों के कुल 67 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है, जबकि बिन्यामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत से काफ़ी कम समर्थन हासिल है (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, रौनक भैड़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

इसराइल में नई सरकार के गठन की कवायद के बीच अरब राजनीतिक दलों ने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़नकोट को समर्थन देने का फ़ैसला किया है. राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भी उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है.

गादी आइज़नकोट के पास अब नई सरकार बनाने की कोशिश करने के लिए 28 दिन होंगे, जिनमें 14 दिन का संभावित विस्तार भी शामिल है.

इसराइल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है. आइज़नकोट के पक्ष में छह राजनीतिक दलों के कुल 67 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है.

वहीं, बिन्यामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत से काफ़ी कम समर्थन हासिल है. इसी वजह से राष्ट्रपति ने उन्हें सरकार बनाने का पहला मौक़ा नहीं दिया.

हालांकि, आइज़नकोट की नीतियों को लेकर भी फ़लस्तीन समर्थक हलकों में सवाल उठते रहे हैं. वह नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट का हिस्सा रह चुके हैं और फ़लस्तीन के मुद्दे पर उनकी नीतियां भी सख़्त मानी जाती हैं.

ऐसे में सवाल है कि नेतन्याहू और आइज़नकोट दोनों के कट्टरपंथी रुख़ के बावजूद अरब राजनीतिक दलों ने आइज़नकोट का समर्थन क्यों किया?

'नेतन्याहू को हटाना मक़सद'

नेतन्याहू
इमेज कैप्शन, अरब दलों का आइज़नकोट को समर्थन देने का फ़ैसला उन्हें सत्ता में लाने से ज़्यादा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की कोशिश है (फ़ाइल फ़ोटो)

दरअसल, अरब दलों का यह फ़ैसला आइज़नकोट की नीतियों से सहमति से ज़्यादा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

इसराइल के अरब राजनीतिक दलों के गठबंधन ज्वाइंट लिस्ट के अध्यक्ष यूसुफ़ जबारीन ने भी इसी राजनीतिक मजबूरी की ओर इशारा करते हुए कहा था, ''हम अच्छे और बेहतर के बीच चुनाव नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारे सामने ख़राब और उससे भी ख़राब विकल्प हैं.''

दिल्ली स्थित थिंक-टैंक भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए) में सीनियर फ़ेलो और मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार डॉ. फ़ज्जुर रहमान सिद्दीकी के मुताबिक़, अरब दलों का आइज़नकोट को समर्थन देने का फ़ैसला उन्हें सत्ता में लाने से ज़्यादा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की कोशिश है.

वह कहते हैं कि अरब दलों की प्राथमिकता यह नहीं है कि आइज़नकोट प्रधानमंत्री बनें या वे ख़ुद सरकार का हिस्सा बनें. उनकी पहली कोशिश यह है कि नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री न बन पाएं.

फ़ज्जुर रहमान सिद्दिकी

डॉ. सिद्दीकी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "अरब दलों को पता है कि नेतन्याहू और आइज़नकोट की फ़लस्तीन, ग़ज़ा, वेस्ट बैंक और हमास जैसे मुद्दों पर नीतियों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. ऐसे में आइज़नकोट का समर्थन करने का मतलब उनकी नीतियों का समर्थन करना नहीं है. पिछले तीन वर्षों में ग़ज़ा में जो कुछ हुआ और नेतन्याहू सरकार ने जिस तरह फ़लस्तीनियों के साथ व्यवहार किया, उसके बाद अरब राजनीतिक दलों के लिए उन्हें सत्ता से बाहर रखना प्राथमिकता बन गया है."

इसराइल में अरब दल यह भी नहीं चाहते कि वे ऐसी सरकार का हिस्सा बनें, जिसकी नीतियों को उनके मतदाता स्वीकार नहीं करते. उनके लिए ऐसा करना अपने राजनीतिक आधार और उन लोगों के भरोसे के साथ समझौता करने जैसा होगा, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है.

अरब नागरिकों के स्थानीय मुद्दे भी हैं अहम

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
नितिन श्रीवास्तव
आपके लिए चुनी गईं खास कहानियाँ, नितिन श्रीवास्तव द्वारा

आपके लिए नितिन श्रीवास्तव द्वारा चुनी गईं खास कहानियाँ

और जानें

समाप्त

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल स्टडीज़ के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर मोहम्मद अयूब मानते हैं कि हैं कि नेतन्याहू सरकार में इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच जैसे दक्षिणपंथी नेताओं की भूमिका को देखते हुए अरब दलों को लगता है कि सरकार बदलने से इसराइल के अरब नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहतर राजनीतिक माहौल बन सकता है.

मोहम्मद अयूब अपने ब्लॉग में लिखते हैं, "अरब दल इस मौक़े का इस्तेमाल अपने समुदाय से जुड़े स्थानीय और आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में शामिल कराने के लिए भी करना चाहते हैं. इन मुद्दों में अरब बहुल शहरों और कस्बों में संगठित अपराध पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त बजट के साथ प्लान लागू करना शामिल है."

इसके अलावा, अरब दलों ने अपने इलाक़ों में घरों की कमी दूर करने और नए मकान बनाने के लिए सरकारी मंज़ूरी की प्रक्रिया आसान करने की मांग की है. वे बिना मंज़ूरी के बने मकानों को नियमित करने और घरों को गिराने की कार्रवाई रोकने की भी मांग कर रहे हैं.

साथ ही, युवा दंपतियों को घर बनाने के लिए ज़मीन देने और बेदुइन समुदाय के उन गांवों को सरकारी मान्यता देने की मांग की गई है, जिन्हें अब तक आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं मिली है.

क़मर आग़ा

रोज़गार, शिक्षा और स्थानीय नगरपालिकाओं को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने के साथ नागरिक और राष्ट्रीय अधिकारों से जुड़े मुद्दे भी उनके एजेंडे में हैं.

हालांकि, ये मांगें फ़िलहाल संभावित गठबंधन के सामने रखी गई बातचीत की शर्तें हैं. आइज़नकोट ने इन्हें स्वीकार करने या लागू करने की कोई वादा नहीं किया है.

मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार क़मर आग़ा भी अरब दलों के इस फ़ैसले को राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव की कोशिश के तौर पर देखते हैं.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में वह कहते हैं कि नेतन्याहू सरकार के दौरान अरब राजनीतिक दलों को हाशिये पर रखा गया. ऐसे में उन्हें लगा कि अगर सरकार बदलती है तो उनके लिए राजनीतिक अवसर पैदा हो सकता है.

क़मर आग़ा ने कहा, "अरब दलों ने अपनी राजनीतिक ताक़त भी दिखाई है. उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि इसराइल की राजनीति में क़रीब 20 फ़ीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले अरब समुदाय को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. अरब दलों को उम्मीद है कि आइज़नकोट की सरकार उनके समर्थन पर निर्भर होगी. ऐसे में उन्हें अपने समुदाय के स्थानीय और आर्थिक मुद्दों पर राहत मिलने की संभावना दिखाई देती है."

क्या आइज़नकोट अरब दलों के समर्थन के लिए अपनी नीतियां बदलेंगे?

आइज़नकोट
इमेज कैप्शन, आइज़नकोट के सामने यह चुनौती है कि यहूदी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सरकार में अरब दलों की भागीदारी का विरोध करता है (फ़ाइल फ़ोटो)

अरब दलों के समर्थन के बावजूद आइज़नकोट के लिए अपनी नीतियों में बदलाव करना आसान नहीं होगा. इसकी एक बड़ी वजह इसराइल की गठबंधन राजनीति और दक्षिणपंथी दलों का प्रभाव है.

इसराइल में सरकारें अक्सर छोटे दक्षिणपंथी दलों के समर्थन पर निर्भर होती हैं. अगर उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं तो वे गठबंधन से समर्थन वापस ले लेते हैं, जिससे सरकार गिरने की नौबत आ जाती है.

दूसरी ओर, आइज़नकोट के सामने यह चुनौती भी है कि यहूदी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सरकार में अरब दलों की भागीदारी का विरोध करता है. ऐसे में अरब दलों को खुलकर समर्थन देने से उनके लिए मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी मतदाताओं को साथ बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.

इसी वजह से आइज़नकोट ने अरब दलों के समर्थन को लेकर अब तक स्पष्ट रुख़ नहीं अपनाया है.

क़मर आग़ा कहते हैं, "नई सरकार का गठन हो भी जाता है तो उसके स्थायित्व को लेकर सवाल बने रहेंगे. इसराइल की राजनीति में गठबंधन टूटना और सांसदों का पाला बदलना असामान्य नहीं है. अलग-अलग दलों के बीच नीतिगत मतभेद सरकार के सामने चुनौती बन सकते हैं."

डॉ. फ़ज्जुर रहमान सिद्दीकी के मुताबिक़, इसराइल की राजनीति लंबे समय से अस्थिर रही है. ऐसे में किसी गठबंधन के लंबे समय तक चलने की गारंटी देना मुश्किल है.

वह कहते हैं कि फ़िलहाल विपक्षी दलों को एकजुट करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखना है. इसके अलावा, इसराइल के नागरिक भी लगातार सुरक्षा और युद्ध से जुड़े मुद्दों के बजाय महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे रोज़मर्रा के सवालों पर ध्यान चाहते हैं.

डॉ. सिद्दीकी के मुताबिक़, अरब दलों के समर्थन से बनने वाली सरकार को कम से कम कुछ समय के लिए राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर राहत देने वाले विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.

हालांकि, इससे इसराइल की फ़लस्तीन नीति में बड़े बदलाव की उम्मीद करना फ़िलहाल मुश्किल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.