अमेरिकी लॉबी फ़र्म और भारतीय अधिकारियों के 'फ़ोन कॉल' को लेकर छपी रिपोर्ट पर क्या है विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ पीएम मोदी (फ़ाइल तस्वीर)
इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ पीएम मोदी (फ़ाइल तस्वीर)
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भारत सरकार और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस साल मई-जून में 'फोन कॉल अरेंज' कराने को लेकर मीडिया में प्रकाशित एक ख़बर पर विवाद छिड़ गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी लॉबिंग फ़र्म एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने व्हाइट हाउस और भारतीय अधिकारियों के बीच कई फोन कॉल की व्यवस्था कराई थी.

इस पर विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, "हालात इतने खराब हो गए हैं कि पीएम मोदी को अपने 'दोस्त, डोनाल्ड ट्रंप' से बात करने के लिए भी एक लॉबिंग फ़र्म की ज़रूरत पड़ रही है."

हालांकि, विदेश मंत्रालय की फै़क्ट चेक टीम ने इस मुद्दे पर एक पत्रकार द्वारा किए गए एक पोस्ट को भ्रामक बताते हुए उसका खंडन किया है.

पूरा मामला क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें कहा गया है कि एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (एफ़एआरए) के तहत दाखिल दस्तावेज में कहा है कि उसने इस साल मई-जून के दौरान भारत सरकार और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच आठ फोन कॉल तय (अरेंज) कराए.

इस अमेरिकी लॉबिंग फ़र्म के प्रमुख जेसन मिलर हैं.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ये बातचीत भारत-अमेरिका संबंधों पर केंद्रित थी और फ़र्म ने इन्हें "राजनीतिक गतिविधियों" का हिस्सा बताया है.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अप्रैल 2025 में जेसन मिलर की एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी के साथ अनुबंध किया था, जिसे इस साल अप्रैल में एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया. हालांकि, 23 जून को यह अनुबंध ख़त्म हो गया क्योंकि जेसन मिलर ट्रंप प्रशासन से विशेष सरकारी कर्मचारी के रूप में जुड़ गए.

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इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मई में मार्को रुबियो के भारत दौरे से पहले भारत सरकार और व्हाइट हाउस के कई वरिष्ठ अधिकारियों के बीच फ़ोन पर बातचीत कराई गई थी. इनमें अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट, उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल नीडहम और आतंकवाद और वित्तीय खुफिया मामलों के अवर सचिव जीन लैंगे शामिल थे.

इसके बाद जून में, मार्को रुबियो की भारत यात्रा के बाद भारत सरकार और अमेरिकी प्रशासन के बीच और भी उच्चस्तरीय संपर्क का ज़िक्र इस रिपोर्ट में है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद, वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास ने दो प्रमुख लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लीं, जिनका नेतृत्व ट्रंप के करीबी माने जाने वाले लोगों के हाथों में था.

इनमें दूसरी फर्म मर्करी पब्लिक अफ़ेयर्स थी, जिसे प्रति माह 75,000 डॉलर की रिटेनरशिप पर रखा गया था. फर्म की मुख्य टीम में ब्रायन लांज़ा शामिल थे, जो ट्रंप की ट्रांजिशन टीम में कम्युनिकेशंस डायरेक्टर रह चुके हैं.

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ने एक एक्स पर एक पोस्ट किया.

इस पोस्ट को फ़ैक्ट चेक करते हुए विदेश मंत्रालय के फ़ैक्ट चेक हैंडल से एक्स पर लिखा गया, "यह पोस्ट भ्रामक है. अमेरिका में दूतावासों और अन्य संस्थाओं द्वारा लॉबिंग फ़र्म नियुक्त करना एक सामान्य चलन है. वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास 1948 से ऐसी फ़र्मों की सेवाएं लेता रहा है. इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है. साथ ही जहां तक मर्करी पब्लिक अफ़ेयर्स एलएलसी की एफ़एआरए फाइलिंग में भी स्पष्ट उल्लेख है कि उसने केवल संबंधित पोस्ट का प्रसार किया था.

द हिंदू की वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने एक्स विदेश मंत्रालय के फ़ैक्ट चेक हैंडल को रिट्वीट करते हुए लिखा, "ये कैसे भ्रामक है, क्या लॉबी फर्म के जरिए व्हाइट हाउस के साथ बातचीत की व्यवस्था करना सामान्य बात है? सभी पूर्व राजनयिकों का कहना है कि लॉबी फर्म आमतौर पर (कैपिटल) हिल पर कामकाज और संपर्क साधने में मदद करती हैं, जबकि द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मामलों पर बातचीत सरकारी अधिकारियों के स्तर पर होती है."

विपक्षी नेता क्या बोले?

टीएमसी सांसद (ममता गुट) महुआ मोइत्रा (फ़ाइल तस्वीर)
इमेज कैप्शन, टीएमसी सांसद (ममता गुट) महुआ मोइत्रा (फ़ाइल तस्वीर)

कांग्रेस ने एक ट्वीट कर पीएम मोदी पर निशाना साधा है. कांग्रेस ने एक्स पर लिखा, " मोदी पैसे देकर ट्रंप से अपनी तारीफ वाले पोस्ट करवा रहे थे. ये खुलासा खुद अमेरिका की मर्करी पब्लिक अफ़ेयर्स नाम की एक लॉबिंग फ़र्म ने किया है. इस फ़र्म को मोदी सरकार ने 75 हजार डॉलर महीने पर रखा था."

वहीं, टीएमसी सांसद (ममता गुट) महुआ मोइत्रा ने कहा, "सच्चाई सामने आ गई है. जब डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अच्छी बातें ट्वीट करते हैं, तो इसकी वजह यह है कि हमने, यानी भारतीय टैक्सपेयर्स ने इसके लिए एक अमेरिकी लॉबिंग फर्म को पैसे दिए हैं! इस मामले पर ध्यान देने के लिए आपका शुक्रिया."

कांग्रेस के राज्य सभा सांसद पवन खेड़ा ने एक्स पर लिखा, "हालात इतने खराब हो गए हैं कि मोदी को अपने 'दोस्त, डोनाल्ड ट्रंप' से बात करने के लिए भी एक लॉबिंग फर्म की जरूरत पड़ रही है.

लेकिन असली बात तो यह है कि हर बार जब ट्रंप मोदी को अपना "बहुत अच्छा दोस्त", "सच्चा दोस्त", "अच्छा दोस्त" या "महान दोस्त" बताते हैं, तो इसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है. और यह कीमत मोदी भारतीय टैक्सपेयर्स के पैसे से लॉबिंग फर्म को भुगतान करके चुकाते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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