दिवाली का त्योहार कब से शुरू हुआ, इसके पीछे की क्या है कहानी

दिवाली के मौके पर फुलझड़ी जलाती बच्ची (फाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, दिवाली के मौके पर फुलझड़ी जलाती बच्ची (फाइल फ़ोटो)
    • Author, मुरलीधरन काशी विश्वनाथन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

(2023 में प्रकाशित एक लेख को दोबारा पोस्ट किया जा रहा है.)

पूरे भारत में दिवाली बड़े ही उत्साह के साथ मनाई जाती है. उत्तर भारत में हर धर्म के लोग अपने-अपने तरीके से जश्न मनाते हैं. इसी से जुड़ा एक सवाल है कि तमिलनाडु में दिवाली कब से मनाई जा रही है.

दिवाली हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. जो हिंदू दूसरे देश में भी रहते हैं, वो वहां भी इसे उत्साह से मनाते हैं. हालांकि देश के हर हिस्से की इस त्योहार से जुड़ी अपनी-अपनी कहानी है.

ये त्योहार ज़्यादातर सालों में तमिल पंचांग के अनुसार कार्तिक माह की अमावस्या के दिन मनाया जाता है. कुछ सालों से ये अमावस्या से एक दिन पहले मनाया जाने लगा.

अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार दिवाली का पर्व लगभग अक्तूबर और नवंबर में पड़ता है.

दिवाली के मौके पर भारत में ही नहीं, कुछ दूसरे देशों में भी इस दिन सरकारी अवकाश घोषित किया गया है.

लेकिन, केवल हिंदू ही नहीं, जैन और सिख जैसे धर्मों के लोग भी ये त्योहार मनाते हैं.

प्रचलति कथाएं क्या हैं?

उत्तर भारत में दिवाली को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. इनमें से एक पौराणिक कथा से जुड़ी है. जिस दिन राम 14 साल का वनवास पूरा करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौटे. उस दिन वहां के लोगों ने दीपक जलाकर उत्सव मनाया.

दक्षिण भारत में प्रचलित कहानी के अनुसार, भगवान कृष्ण ने भीषण तबाही मचा रहे राक्षस नरकासुर को मारा था. लोग उसकी मृत्यु के दिन को लोग उत्सव की तरह मना रहे हैं.

हालांकि तमिल एंटीकास्ट थिंकर पंडित अयोधिदासर के अनुसार, "दिवाली बौद्ध धर्म का त्योहार है. इसे ब्राह्मणों ने अपना लिया था."

अयोधिदासर ने 13 नवंबर 1907 को दिवाली पर एक लेख लिखा था. उस लेख का शीर्षक 'दीपावती स्नानावरम' है. इसमें उन्होंने दिवाली को बौद्ध त्योहार बताया है.

छोटी बच्ची के साथ दिवाली का जश्न मनाती महिला(फाइल फ़ोटो)
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पंडित अयोथीदासर लिखते हैं कि हर साल सभी लोग तिल के तेल से पकवान बनाते थे. वो 'दीपवती नदी' में स्नान करते थे. नए कपड़े पहनते थे और ग़रीबों को भोजन दान देते थे. इसे कार्तिक महीने की चतुर्दशी को दीपवती स्नान दिवस के रूप में मनाया जाता था.

उनके अनुसार, "जब पूरे देश में बौद्ध धर्म फैला हुआ था, तब अमीर से लेकर ग़रीब तक सभी लोग इस पर्व को बड़े आनंद के साथ मनाते थे."

"बाद में दूसरे समुदायों के लोग यहां आकर बस गए."

अयोथीदासर का कहना है कि इसके बाद बौद्ध धर्म कमज़ोर पड़ने लगा, शराब की दुकानें खुलने लगीं. लोगों में शिक्षा की कमी आई.

"वे ज़्यादा सवाल-जवाब या खोजबीन भी नहीं करते थे. इस वजह से वो इस पर्व का असली इतिहास नहीं जान पाए."

अयोथीदासर आगे लिखते हैं कि लोगों ने जब अपने गुरुओं से इस त्योहार के बारे में पूछा. तो गुरुओं को भी इसकी सही जानकारी नहीं थी.

"तभी ये कहानी प्रचलित की गई कि एक बहुत बड़ा असुर था, जो देवताओं को परेशान करता था. फिर एक देवता ने उसका वध कर दिया. इससे देवताओं को सुख और शांति मिली. इसी ख़ुशी में लोग स्नान करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और पकवान बनाकर खाते हैं."

अयोथीदासर का कहना है कि ये एक गढ़ी हुई कहानी थी.

जैन धर्म में धारणा

दिवाली के दिन पूजा की जाती है (फाइल फ़ोटो)
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माइलाई सीनी वेंकटसामी का मानना था कि दीपावली मूल रूप से जैन धर्म का पर्व था. वो लिखते हैं कि जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर पावापुरी नगर में एक राजा के महल में ठहरे हुए थे. वहां उन्होंने लोगों को धर्म और नैतिकता का उपदेश दिया.

"ये प्रवचन पूरी रात चला. सुबह इसका समापन हुआ. रात भर जागने के कारण लोग अपने घर नहीं लौटे. वे वहीं अलग-अलग जगहों पर सो गए."

वेंकटसामी के अनुसार, "इसी दौरान महावीर ने अपने आसन पर ही निर्वाण प्राप्त कर लिया. जब लोग जागे, तो उन्हें पता चला कि महावीर स्वामी निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं. इसकी सूचना राजा को दी गई."

"इसके बाद राजा ने दूसरों से विचार-विमर्श किया. उन्होंने तय किया कि महावीर स्वामी की याद करने के लिए हर घर में दीप जलाए जाएं. तब से लोगों ने दीप जलाकर ये पर्व मनाना शुरू किया."

वेंकटसामी का कहना है कि जैन धर्म के पतन के बाद बड़ी संख्या में जैन लोग हिंदू धर्म में शामिल हो गए. लेकिन उन्होंने दीपावली मनाने की अपनी पुरानी परंपरा नहीं छोड़ी. वो पहले की तरह ये पर्व मनाते रहे.

"हिंदू समाज भी इस परंपरा को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका. इसलिए उसने भी इसे अपना लिया."

हालांकि, वेंकटसामी के अनुसार, इसके साथ एक नई पौराणिक कथा जोड़ दी गई. इसमें नरकासुर के मारने का ज़िक्र किया गया और उसी की याद में दिवाली मनाई जाती है.

लेकिन वेंकटसामी इस कहानी को तर्कसंगत नहीं मानते हैं.

उनका कहना है कि दीपावली को स्वीकार न करने की वजह से बाद में नरकासुर की ये कहानी गढ़ी गई.

'तमिल इतिहास में दीपावली का ज़िक्र नहीं'

दिवाली का जश्न (फाइल फ़ोटो)
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ये सभी बातें दिवाली की उत्पत्ति से जुड़ी कहानियां हैं. लेकिन ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि उस समय दिवाली वास्तव में मनाई जाती थी.

इस जुड़े रिकॉर्ड देखें, तो तमिल भाषा में दिवाली के बारे में बहुत कम उल्लेख मिलते हैं.

शोधकर्ता प्रोफ़ेसर वेल्सामी का कहना है कि तमिल इतिहास में 19वीं सदी तक दीपावली का कोई उल्लेख नहीं मिलता. तमिल साहित्यकार वीरमामुनिवर की 'सदुरकरादी' तमिल नामक शब्दकोश 1732 में प्रकाशित हुई थी.

"लेकिन उसमें दिवाली शब्द नहीं मिलता."

"तमिल साहित्य में भी 19वीं सदी तक दीपावली का कोई उल्लेख नहीं दिखाई देता. हालांकि, 1842 में श्रीलंका में प्रकाशित मानिप्पाय तमिल, तमिल शब्दकोश में ये शब्द मिलता है. उसमें दीपावली से जुड़ी पौराणिक व्याख्याएं भी दी गई हैं."

वेल्सामी का मानना है कि संभव है, इसी दौर में ये त्योहार तमिल समाज में परिचित हुआ हो. वो ये भी बताते हैं कि तमिल परंपरा में ज़्यादातर त्योहार फसल कटने के बाद मनाए जाते हैं. लेकिन दिवाली के साथ ऐसा कोई संबंध नहीं दिखाई देता.

वेल्सामी के अनुसार, 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में भी ये नहीं कहा जा सकता कि दीपावली बहुत लोकप्रिय त्योहार हुआ करता था.

वो सामीनाथ अय्यर की आत्मकथा 'एन सरित्तरम' का भी उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि इस पुस्तक में दीपावली के बारे में कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता.

इसके अलावा, जो विदेशी यात्री तमिलनाडु आए और यहां के समाज, रीति-रिवाज़ों और अपने यात्रा अनुभवों के बारे में लिखकर गए, उनके विवरणों में भी दिवाली का ज़िक्र नहीं मिलता.

हालांकि, वेल्सामी ये स्वीकार करते हैं कि कार्तिक महीने में दीये जलाकर कुछ धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान किए जाते थे.

लेकिन उनका कहना है कि उन परंपराओं का आज मनाई जाने वाली दिवाली से कोई सीधा संबंध नहीं है.

तमिलनाडु में त्योहार

दिवाली का जश्न (फाइल फ़ोटो)
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सांस्कृतिक शोधकर्ता परमशिवन भी मानते हैं कि प्राचीन तमिलनाडु में दीपावली नाम का कोई त्योहार नहीं था. उन्होंने 'सामाजिक इतिहास की दृष्टि से त्योहार' नामक लेख में इस विषय पर विस्तार से लिखा है.

परमशिवन के अनुसार, "तमिलनाडु के ज़्यादातर पारंपरिक त्योहार तमिल पंचांग थै महीने से आड़ी महीने के बीच मनाए जाते थे.

"तमिलनाडु एक गर्म जलवायु वाला क्षेत्र है. इसलिए यहां त्योहार आमतौर पर उस समय मनाए जाते थे, जब खेती से जुड़े काम कम होते थे."

परमशिवन के मुताबिक़, "तमिलनाडु के लोक देवताओं के उत्सव भी इसी अवधि में आयोजित किए जाते थे. वो आगे कहते हैं कि आज जो दिवाली बड़े पैमाने पर मनाई जाती है, वो विजयनगर शासकों के काल में तेलुगु ब्राह्मणों के माध्यम से तमिलनाडु पहुंची थी."

उनके अनुसार, उत्तर भारत में ये मूल रूप से जैन धर्म से जुड़ा एक त्योहार था.

हालांकि, लोक संस्कृति के शोधकर्ता शिवसुब्रमणियम इस बहस को दूसरे नज़रिए से देखते हैं.

उनका कहना है कि जब ज़्यादातर लोग किसी त्योहार को ख़ुशी के साथ मना रहे हों, तब ये बहस करना ज़रूरी नहीं कि वो त्योहार कहां से आया या उसे मनाना चाहिए या नहीं.

वो मानते हैं कि जिसे त्योहार मनाना अच्छा लगता है, वो उसे मनाए. और जिसे न मनाना हो, वो उसे न मनाए.

शिवसुब्रमणियम कहते हैं, "जब लोग ख़ुशी से पटाखे फोड़ रहे हैं, नए कपड़े पहन रहे हैं और त्योहार मना रहे हैं, तब उसकी आलोचना करके या लोगों को दुखी करके क्या ही हासिल होगा."

उनका कहना है, "जिनकी इच्छा हो, वो दीपावली मनाएं, जिनकी इच्छा ना हो, वो शांति से घर में रहें."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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