घरों पर ताले, स्कूल छोड़ते बच्चे, दिवाली से पहले क्यों सूने पड़े गांव?

यवतमाल ज़िले में सूखा
इमेज कैप्शन, यवतमाल के एक किसान मनीष जाधव ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा था कि ज़िले में 1972 के सूखे से भी बुरे हालात हैं
    • Author, भाग्यश्री राउत
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

एक घर में लोग दिखते हैं, तो आसपास के चार-पांच घर बंद मिलते हैं. कुछ घरों के बाहर सिर्फ़ बुज़ुर्ग बैठे थे. वे अपने बच्चों और पोते-पोतियों का इंतज़ार कर रहे थे.

कई गलियां बिल्कुल सुनसान दिख रही थीं. गांव में करीब 60 फ़ीसदी घरों पर ताले लगे हुए थे.

ये तस्वीर महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले के महागांव तहसील के वाकद इजारा गांव की है. सूखे का गांवों पर क्या असर हो रहा है?

इसे समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ की टीम सबसे ज़्यादा सूखे से प्रभावित यवतमाल ज़िले के पुसद और महागांव इलाकों में पहुंची.

वहां के कई गांवों में हमें ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला. तो सवाल यही है कि इन गांवों के लोग घरों पर ताले लगाकर आख़िर कहां चले गए?

सूखे की वजह से खेत सूख गए हैं. इस वजह लोग काम की तलाश में गांवों को छोड़ दिया. कुछ लोग पुणे, मुंबई और गुजरात चले गए हैं.

वहीं, कुछ लोग तेलंगाना में कपास के खेतों में काम करने के लिए गए हैं.

'खेत में कुछ नहीं उगा तो बेटा शहर चला गया'

सूखे की वजह से ज़मीन में दरारें पड़ गई हैं, जिससे कपास के पौधों की लंबाई नहीं बढ़ी है
इमेज कैप्शन, सूखे की वजह से ज़मीन में दरारें पड़ गई हैं, जिससे कपास के पौधों की लंबाई नहीं बढ़ी है

सूखे की मार ने किसानों को भी गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. इन्हीं किसानों में एक प्रल्हाद राठौड़ हैं.

उनके पास साढ़े चार एकड़ खेती है. लेकिन इस साल खेत में कुछ भी नहीं उगा.

सोयाबीन की फ़सल पूरी तरह बर्बाद हो गई. वहीं, कपास की फ़सल भी सूखने लगी.

जब ये दिखने लगा कि खेत से कोई पैदावार नहीं होगी, तो उनके बेटे वामन ने अगस्त में ही अपने परिवार के साथ पुणे का रुख़ कर लिया.

वहां वे पल्लेदारी यानी बोझ ढोने का काम करते हैं. दिवाली के बाद प्रल्हाद के दो और बेटे भी रोज़गार की तलाश में दूसरी जगह जाने वाले हैं.

प्रल्हाद कहते हैं, "मेरा बेटा खेती करता था. अगर कहीं मज़दूरी मिलती थी, तो वो भी कर लेता था. लेकिन इस साल खेत में कुछ भी नहीं उगा."

"सभी किसानों की हालत एक जैसी है, इसलिए मज़दूरी का काम भी नहीं मिल रहा. इसी वजह से मेरा बेटा परिवार के साथ पुणे चला गया."

प्रल्हाद कहते हैं कि गांव में खाने-पीने का कोई सहारा ही नहीं बचा है, ऐसे में क्या करें?

'कोई 200 रुपये की मज़दूरी देने को भी नहीं तैयार'

किसान और खेतिहर मजदूरों के पलायन की वजह से सूनसान गलियां
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नितिन श्रीवास्तव
आपके लिए चुनी गईं खास कहानियाँ, नितिन श्रीवास्तव द्वारा

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समाप्त

प्रल्हाद के घर के पीछे वाला इलाका, जो गांव का आख़िरी छोर है. वहां पर कुछ महिलाएं बैठी हुई दिखाई दीं.

वहां भी कई घरों पर ताले लगे हुए थे. जब हमने उनसे बात की, तो पता चला कि उनके परिवार के लोग भी रोज़गार की तलाश में बाहर गए हुए हैं.

इन महिलाओं में 50 वर्षीय ललिता राठौड़ भी शामिल थीं. उनका बेटा और पति एक महीने पहले रोज़गार की तलाश में पुणे गए हैं. अब ललिता घर में अकेली रहती हैं.

वो कहती हैं, "ऐसा सूखा पड़ा है कि यहां कोई 200 रुपये की मज़दूरी देने को भी तैयार नहीं है. मेरे घर के लोग पुणे चले गए हैं. अब दिवाली के बाद मैं भी वहां जाऊंगी."

"शहर में किसी के घर बर्तन मांजने या खाना बनाने का काम तलाश करूंगी. पेट पालने के लिए जाना पड़ेगा. यहां रुककर भूखे नहीं मर सकते."

यवतमाल ज़िले के गांवों की बसावट दो हिस्सों में होती है. इनमें से एक बस्ती और दूसरा तांडा है.

बस्ती पुरानी बसावट होती है. इसमें अलग-अलग जातियों और आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं. वहीं, तांडे में सिर्फ़ बंजारा समुदाय के लोग रहते हैं.

वाकद इजारा गांव में भी आदिवासी और दलित समुदाय के लोग बस्ती में रहते हैं.

तांडे में तो घरों पर ताले लगे ही हैं. लेकिन बस्ती की हालत भी अलग नहीं है.

इस गांव में एक रिश्तेदार की मौत की वजह से पलायन कर चुके कुछ लोग वापस आए थे. इन्हीं लोगों से हमारी मुलाक़ात हुई.

महाराष्ट्र का यवतमाल
इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र के यवतमाल में सूखे के कारण खेतों में खड़ी फसलें सूख गई हैं

गोकर्णा कांबले 15 दिन पहले काम के लिए पुणे के नारायणगांव गई थीं. लेकिन वहां उनके परिवार की एक लड़की की हादसे में मौत हो गई.

इस वजह से उन्हें गांव वापस आना पड़ा.

वह कहती हैं, "हमें उम्मीद थी कि खेत में कुछ न कुछ फ़सल हो जाएगी. लेकिन कुछ भी नहीं उगा."

"15 दिन पहले हम पुणे गए थे. वहां कोई 200 रुपये मज़दूरी देता है, तो कोई 300 रुपये."

गोकर्णा बताती हैं, "लेकिन चार दिन काम मिलता है, तो आठ दिन घर पर ही बैठना पड़ता है. काम ही नहीं मिलता."

अब दिवाली के बाद फिर से काम की तलाश में पुणे जाने वाली हैं. उनके पास खेती है. लेकिन, खेत में कुछ भी नहीं उगा. इसी वजह से उन्हें पलायन करना पड़ रहा है.

'सरकार योजना बनाती, तो पलायन नहीं होता'

गांव के स्कूलों में पढ़ाई करने वाले छात्र माता-पिता के साथ गए शहर
इमेज कैप्शन, गांव के स्कूलों में पढ़ाई करने वाले छात्र माता-पिता के साथ गए शहर

इस इलाक़े पर सूखे की मार इतनी ज़्यादा है कि अभी से नदियां और नाले सूख चुके हैं. बोरी गांव के पास बहने वाले नाले में पहले फ़रवरी तक पानी रहता था. लेकिन अब वह नाला सूख गया है.

तालाब भी सूख चुके हैं. ज़मीन में दरारें पड़ गई हैं. कपास की फ़सल बढ़ नहीं पाई है. वहीं, बरसात पर निर्भर खेतों में कपास के पौधों पर फूट भी नहीं आई है. इसी वजह से खेत मज़दूरों और किसानों को पलायन करना पड़ रहा है.

लेकिन किसान मनीष जाधव का कहना है कि अगर गांव में ही मज़दूरी मिलती और सरकार ने पहले से योजना बनाई होती, तो गांव इस तरह सूना नहीं पड़ता.

वो कहते हैं, "हमारा सरकार से यही सवाल है. सरकार को पता था कि अल नीनो का असर पड़ सकता है. ऐसे में सिर्फ़ कागज़ी काम करने के बजाय माइक्रो प्लानिंग करनी चाहिए थी. रोज़गार गारंटी योजना के ज़रिए पहले से तैयारी की जाती, तो आज किसानों और खेत मज़दूरों पर यह नौबत नहीं आती."

"सिर्फ़ कागज़ों पर घोषणाएं की गईं. सिर्फ़ रोज़गार गारंटी योजना का नाम बदल देने से लोगों को रोज़गार नहीं मिलने वाला."

'पेट भरना ज़रूरी, पढ़ाई अगले साल'

इस पलायन का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा है. पढ़ाई कर रहे कई बच्चे अपने माता-पिता के साथ गांव छोड़कर चले गए हैं.

गांव के प्राथमिक स्कूल से छह बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है. वे अपने माता-पिता के साथ मज़दूरी के लिए बाहर चले गए हैं.

गांव के लोग बताते हैं कि पलायन करने वालों में सबसे ज़्यादा संख्या माध्यमिक स्कूल के बच्चों की है.

प्रल्हाद राठौड़ के दो पोते भी इनमें शामिल हैं. वो स्कूल छोड़कर अपने माता-पिता के साथ पुणे चले गए.

प्रल्हाद कहते हैं, "अब वे स्कूल नहीं जा रहे हैं. वे पढ़ाई छोड़कर चले गए. अगर यहां होते, तो स्कूल जाते. जब खाने-पीने का ही कोई सहारा नहीं बचा, तो पढ़ाई कैसे जारी रहती?"

गोकर्णा भी अपने बेटे, बहू और पोते को लेकर पुणे गई थीं. हालांकि, वह कुछ दिनों के लिए गांव लौटी हैं. लेकिन, बाक़ी लोग अब भी पुणे में हैं.

वो कहती हैं, "सरकार हमें काम दे, ताकि बच्चों की पढ़ाई जारी रह सके. हम अपने पोते को साथ लेकर गए थे. उसकी पढ़ाई छूट गई. अब काम ही नहीं है, तो हम क्या करें?"

"पेट भरना भी ज़रूरी है. पढ़ाई तो अगले साल भी हो सकती है."

गांव के प्राथमिक स्कूल में कुल 43 बच्चे दर्ज हैं. इनमें से छह बच्चे अपने माता-पिता के साथ मज़दूरी के लिए पलायन कर चुके हैं.

वहीं, कुछ बच्चे अपनी दादी या दूसरे रिश्तेदारों के पास रहकर पढ़ाई कर रहे हैं.

स्कूल के शिक्षक उत्तम देशमुख कहते हैं, "हर साल ऐसी स्थिति नहीं होती. इस साल सूखा पड़ा है. ज़्यादातर लोगों की रोज़ी-रोटी दिहाड़ी पर निर्भर है. इस वजह से गुज़ारे का बड़ा संकट खड़ा हो गया. लोग बच्चों को साथ लेकर रोज़गार की तलाश में बाहर चले गए हैं."

फ़िलहाल गांव में सिर्फ़ 30 से 40 फ़ीसदी लोग ही दिखाई देते हैं. लेकिन गांव के लोगों का कहना है कि वे भी सिर्फ़ दिवाली तक यहां रुके हैं. इसके बाद वे भी मज़दूरी के लिए बाहर चले जाएंगे.

गांव के लोग यह डर भी जता रहे हैं कि उसके बाद पूरा गांव लगभग सुनसान हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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