आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच छिड़ा 'पोस्टर वॉर', दोनों में क्यों बढ़ रही हैं दूरियां?

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कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तकरार कोई नई बात नहीं है. लेकिन पंजाब चुनाव से पहले अब ये तीखी बयानबाज़ी निजी हमलों तक पहुंच गई है.
चार नवंबर को पंजाब के संगरूर में कांग्रेस की रैली में राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि जब भगवंत मान लोकसभा सांसद थे, तब सुबह 11 बजे भी उनके मुंह से शराब की गंध आती थी.
राहुल गांधी ने कहा कि अगर किसी राज्य में नशे के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी है तो वहां के मुख्यमंत्री को ख़ुद नशे से दूर रहना चाहिए.
उन्होंने पंजाब सरकार पर दिल्ली से चलने का आरोप लगाते हुए कहा कि यहां आधी कमान अमित शाह और आधी अरविंद केजरीवाल के हाथ में है.
आप नेता और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने राहुल गांधी के बयान को उनके क़द के नेता के लिए 'छोटी बात' बताया. उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई बीजेपी से है या विपक्षी पार्टियों से?
इसके बाद दोनों पार्टियों के बीच सोशल मीडिया पर भी हमला तेज़ हो गया.
आदमी पार्टी ने राहुल गांधी को लेकर एक पोस्टर जारी किया, जिसमें उनपर व्यक्तिगत हमला किया गया. जवाब में कांग्रेस नेता बीवी श्रीनिवास ने अरविंद केजरीवाल की एक तस्वीर पोस्ट की, इसमें भी व्यक्तिगत हमला किया गया.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पंजाब कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने भी भगवंत मान सरकार पर भ्रष्टाचार और पंजाब के हितों की अनदेखी करने के आरोप लगाए.
दोनों पार्टियों के बीच यह टकराव ऐसे समय में बढ़ा है, जब पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं.
लेकिन क्या इस लड़ाई की वजह सिर्फ़ पंजाब चुनाव है या दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक अविश्वास की जड़ें इससे कहीं गहरी हैं?
पंजाब चुनाव से आगे की कहानी?

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आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के रिश्तों में विरोधाभास शुरू से रहा है. एक तरफ़ दोनों पार्टियां ख़ुद को बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी राजनीति का हिस्सा बताती रही हैं, तो दूसरी तरफ़ कई राज्यों में एक-दूसरे की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हैं.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री मानते हैं कि पंजाब चुनाव मौजूदा टकराव की तात्कालिक वजह है, लेकिन दोनों पार्टियों के बीच विरोध का इतिहास इससे कहीं पुराना है.
वह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने अपने उदय से लेकर आज तक बीजेपी पर हमला ज़रूर किया है, लेकिन उनकी मेन टारगेट पर कौन रहता है? ये हमेशा देखने की बात है. वो कांग्रेस पार्टी है."
हेमंत अत्री के मुताबिक़, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस बुनियादी तौर पर दो अलग राजनीतिक ध्रुव हैं. कुछ विशेष परिस्थितियों में दोनों साथ आने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है.
वह कहते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में भी दोनों के बीच नज़दीकी की गुंजाइश अब बहुत कम रह गई है.
अत्री के मुताबिक़, आम आदमी पार्टी की मौजूदा राजनीतिक ताक़त मुख्य रूप से पंजाब तक सीमित है. आम आदमी पार्टी के कई राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने के बाद संसद में भी पार्टी की स्थिति कमज़ोर हुई है.
विश्लेषक मान रहे हैं कि इन्हीं कारणों से राष्ट्रीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है.
2013 में कांग्रेस के समर्थन से बनी थी केजरीवाल सरकार

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आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के रिश्तों का इतिहास समझने के लिए 2013 में लौटना होगा.
अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई थी. इस आंदोलन का एक बड़ा निशाना तत्कालीन कांग्रेस सरकार थी. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से निकली पार्टी ने कांग्रेस की राजनीति को चुनौती दी.
दिसंबर 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस आठ सीटों पर सिमट गई. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से दूर रही.
ऐसे में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को बाहर से समर्थन दिया और अरविंद केजरीवाल पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने.
हालांकि, यह सरकार सिर्फ़ 49 दिन चली. जनलोकपाल विधेयक विधानसभा में पेश नहीं हो पाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफ़ा दे दिया.
इसके बाद दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ता गया.
2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीत लीं और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला. 2020 में भी आम आदमी पार्टी ने 62 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी, जबकि कांग्रेस एक बार फिर कोई सीट नहीं जीत पाई.
इसके बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की कोशिशों के दौरान दोनों पार्टियां एक मंच पर आईं.
जून 2023 में बने विपक्षी गठबंधन इंडिया में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों शामिल हुईं.
2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने दिल्ली, गुजरात, हरियाणा और चंडीगढ़ में सीटों का बंटवारा किया. हालांकि, पंजाब में दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा.
यह साथ भी ज़्यादा समय तक नहीं चला.
2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां फिर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ उतरीं. बीजेपी ने 48 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की, जबकि आम आदमी पार्टी को 22 सीटें मिलीं और कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई.
इसके बाद आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से अपनी दूरी सार्वजनिक कर दी. जुलाई 2025 में संजय सिंह ने कहा कि इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव के लिए बना था और आम आदमी पार्टी अब उसका हिस्सा नहीं है.
इस साल अप्रैल में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने से भी दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज़ हुए.
इस तरह विपक्षी एकता के लिए बना इंडिया ब्लॉक अब दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक सहयोग का आधार नहीं रह गया है.
'दोस्ती की उम्मीद करना ही ग़लत है'

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वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी मानती हैं कि मौजूदा हालात में दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक दोस्ती की उम्मीद करना ही ग़लत है.
वह कहती हैं, "ये उम्मीद करना कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी साथ रहें, एक बेवकूफ़ी है."
सबा नक़वी के मुताबिक़, इसकी सबसे बड़ी वजह पंजाब है. वहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है. ऐसे में दोनों पार्टियों के लिए एक-दूसरे के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना स्वाभाविक है.
वह कहती हैं कि पंजाब कांग्रेस का पारंपरिक राजनीतिक आधार रहा है और पार्टी उसे वापस हासिल करना चाहेगी.
सबा नक़वी के मुताबिक़, आम आदमी पार्टी के लिए भी पंजाब को बचाना ज़रूरी है. दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के पास पंजाब ही एकमात्र राज्य है, जहां उसकी सरकार है.
वह कहती हैं, "आम आदमी पार्टी को पंजाब बचाना है, नहीं तो कुछ बचेगा नहीं उनके हाथ में."
सबा नक़वी इसे आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व का सवाल मानती हैं.
नक़वी कहती हैं, "कांग्रेस लंबे समय से आम आदमी पार्टी को बीजेपी की बी टीम कहती रही है. लेकिन अब राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को उन क्षेत्रीय दलों के साथ भी काम करना पड़ रहा है, जिन्हें वह पहले बीजेपी की बी टीम बताती थी."
इसका उदाहरण देते हुए वह तृणमूल कांग्रेस का ज़िक्र करती हैं. उनके मुताबिक़, कांग्रेस बीजेपी के ख़िलाफ़ व्यापक विपक्षी एकता की ज़रूरत समझती है, लेकिन आम आदमी पार्टी को स्वीकार करने में उसे अब भी मुश्किल हो रही है.
नक़वी कहती हैं, "आम आदमी और कांग्रेस के बीच तकरार अभी और बढ़ेगी क्योंकि पंजाब में आम आदमी पार्टी को यह दिखाना है कि वह कांग्रेस की धुर विरोधी है."
पंजाब में किसका पलड़ा भारी?

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पंजाब की राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिद्धू के मुताबिक़, अगले विधानसभा चुनाव में सीधा मुक़ाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच होने की संभावना है.
वह कहते हैं, "दोनों की आपस में सीधी टक्कर है और मुक़ाबला इन्हीं दोनों में होगा. बाकी जो पार्टियां हैं, जैसे अकाली दल और बीजेपी, वो तीसरी पोज़िशन पर होंगी."
जसपाल सिद्धू के मुताबिक़, पंजाब में इस बार दो बड़े मुद्दे नशे की समस्या और गैंगस्टर संस्कृति हो सकते हैं.
वह कहते हैं कि नशे की वजह से बड़ी संख्या में युवाओं की मौतें हो रही हैं और गैंगस्टरों का बढ़ता प्रभाव भी लोगों की चिंता का विषय है.
जसपाल सिद्धू मानते हैं कि 2022 में आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे कई परिस्थितियां थीं. किसान आंदोलन के बाद बने माहौल, कांग्रेस की अंदरूनी कलह और अकाली दल के ख़िलाफ़ नाराज़गी ने पार्टी को फ़ायदा पहुंचाया.
वह कहते हैं कि कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई ने एक राजनीतिक खालीपन पैदा किया, जिसका फ़ायदा आम आदमी पार्टी को मिला.
लेकिन जसपाल सिद्धू के मुताबिक़, इस बार आम आदमी पार्टी के समर्थन में वैसी कोई लहर नहीं है जैसी पिछले चुनाव में थी.
उनके मुताबिक़, कांग्रेस का पंजाब में संगठनात्मक ढांचा आम आदमी पार्टी से कहीं ज़्यादा मज़बूत है.
वह कहते हैं, "कांग्रेस बेहतर स्थिति में है क्योंकि उसका पंजाब के हर गांव और शहर में 50-60 सालों से मज़बूत नेटवर्क बना हुआ है."
जसपाल सिद्धू के मुताबिक़, आम आदमी पार्टी के पास कांग्रेस जैसा कैडर नेटवर्क नहीं है. इसलिए वह सोशल मीडिया और बयानों के ज़रिए कांग्रेस को निशाना बनाकर मुक़ाबले को सीधे कांग्रेस बनाम आम आदमी पार्टी दिखाने की कोशिश कर रही है.
हालांकि, वह मानते हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार की कुछ योजनाएं उसके लिए अब भी राजनीतिक ताक़त हैं.
इनमें मुफ़्त बिजली, महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ़्त सफ़र, खेती के लिए ट्यूबवेल की रियायती बिजली और मंडियों में फ़सलों की ख़रीद शामिल हैं.
जसपाल सिद्धू के मुताबिक़, ग्रामीण पंजाब में भगवंत मान की छवि उतनी ख़राब नहीं है, जितनी आलोचना शहरी और पढ़े-लिखे तबक़े में देखने को मिलती है.
आप के लिए अस्तित्व की लड़ाई?

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पंजाब का चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए सिर्फ़ एक राज्य की सत्ता बचाने का चुनाव नहीं है.
दिल्ली में सत्ता गंवाने और राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद पंजाब ही वह राज्य है, जहां आम आदमी पार्टी के पास सरकार, राजनीतिक संसाधन और संगठन चलाने का सबसे बड़ा आधार है.
हेमंत अत्री के मुताबिक़, पार्टी की वित्तीय स्थिरता भी पंजाब की सत्ता से जुड़ी हुई है.
वह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी का पॉलिटिकल सर्वाइवल जो रिसोर्सेज हैं और एक पार्टी के संचालन करने के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत होती है, वो तो सब पंजाब से ही आ रहा है."
उनके मुताबिक़, अगर पंजाब में सरकार चली जाती है तो पार्टी के सामने वित्तीय स्थिरता का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
जसपाल सिद्धू भी इसे आम आदमी पार्टी के लिए सर्वाइवल की लड़ाई मानते हैं.
हालांकि, वे कहते हैं, "पार्टी के पास अपनी सरकार की योजनाओं और भगवंत मान की ग्रामीण इलाक़ों में मौजूद स्वीकार्यता के रूप में कुछ राजनीतिक ताक़त अब भी है."
इसलिए पंजाब में चुनावी मुक़ाबला सिर्फ़ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता का नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आम आदमी पार्टी अपनी सत्ता और संगठन को कितनी मज़बूती से बचा पाती है.
राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकता का क्या होगा?

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पंजाब की लड़ाई का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है.
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने अलग-अलग समय पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. लेकिन दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी गहरी है कि एक साझा मंच पर उनकी मौजूदगी भी कई बार असहज रही है.
कांग्रेस का तर्क रहा है कि आम आदमी पार्टी उन राज्यों में चुनाव लड़कर विपक्षी वोट बांटती है, जहां कांग्रेस बीजेपी को चुनौती दे रही होती है.
वहीं आम आदमी पार्टी का कहना है कि कांग्रेस ख़ुद बीजेपी को चुनौती देने में नाकाम रही है और उसे क्षेत्रीय दलों के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग करना चाहिए.
हेमंत अत्री कहते हैं, "राष्ट्रीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की मौजूदा स्थिति ऐसी नहीं है कि उसके बिना विपक्षी राजनीति का कोई बड़ा समीकरण प्रभावित हो."
उनके आकलन में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई है और दूसरे दल अपनी राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से इन दोनों के इर्द-गिर्द रहते हैं.
वहीं, सबा नक़वी का मानना है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच मौजूदा दूरी को केवल व्यक्तिगत नेताओं के बयानों या सोशल मीडिया की लड़ाई के रूप में नहीं देखना चाहिए. यह दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक जगह और नेतृत्व की लड़ाई भी है.
ऐसे में सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि 2027 में पंजाब में किसकी सरकार बनेगी.
सवाल यह भी है कि क्या आम आदमी पार्टी पंजाब में अपनी सत्ता बचाकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख पाएगी और क्या कांग्रेस उसे बीजेपी के ख़िलाफ़ किसी व्यापक विपक्षी गठबंधन में फिर से स्वीकार करने को तैयार होगी.
फ़िलहाल दोनों पार्टियों के बीच जिस तरह की तल्ख़ी दिखाई दे रही है, उससे निकट भविष्य में किसी राजनीतिक समझौते की संभावना कम ही नज़र आती है.
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बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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