अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों से भारत को क्या फ़ायदा होगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनावों में भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर में एक चुनावी रैली में कहा था कि आगामी मिडटर्म चुनाव में आप यह मानकर चलिए कि मतपत्रों पर मेरा ही नाम है.

यानी, एक तरह से उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि भले ही आपका उम्मीदवार कोई भी हो, आप यह मानकर चलिए कि आपका वोट राष्ट्रपति ट्रंप के लिए है.

इस हफ़्ते आए चुनाव नतीजों में राष्ट्रपति ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. उनकी रिपब्लिकन पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों, सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स पर अपना नियंत्रण खो दिया है. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सदनों में बड़ी जीत हासिल की है.

इन चुनावों के नतीजे अमेरिकी राष्ट्रपति की राजनीतिक ताक़त पर असर डालते हैं. यही वजह है कि ये चुनाव पूरी दुनिया के लिए भी अहम हो जाते हैं. दुनिया की कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारत जैसे देशों के साथ अमेरिका की साझेदारी पर भी इन नतीजों का असर पड़ सकता है.

तो सवाल यह है कि आख़िर मतदाता ट्रंप से नाराज़ क्यों हुए और भारत के लिए इन चुनावी नतीजों के क्या मायने हैं?

डेमोक्रेटिक पार्टी की इस जीत से भारत के सामने कूटनीतिक लिहाज़ से कुछ नए मौक़े भी हैं और आगे की रणनीति को लेकर चुनौतियां भी.

अमेरिका भारत के सबसे अहम और व्यापक साझेदारों में से एक है. दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर सहयोग रहा है. लेकिन ट्रंप की इस चुनावी हार से अमेरिका का राजनीतिक माहौल बदल सकता है.

फ़िलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास ट्रंप से मुलाक़ात के दो मौक़े हो सकते हैं.

पहला, इसी महीने मनीला में होने वाला ईस्ट एशिया समिट और दूसरा, दिसंबर में मियामी में होने वाला जी-20 शिखर सम्मेलन.

इन मुलाक़ातों के ज़रिए भारत के पास मौक़ा होगा कि वह पिछले कुछ समय से उतार-चढ़ाव से गुज़र रहे भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई दिशा दे सके.

तो सबसे पहले सवाल यही है कि क्या सत्ता का यह बदला हुआ संतुलन व्यापार, टैरिफ़ और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को लेकर अमेरिकी प्रशासन के फ़ैसलों पर भी कोई बंदिश लगा सकता है?

अमेरिका से बाहर क्या इन नतीजों से वैश्विक कूटनीति की दिशा भी बदलेगी? क्या अमेरिका के सहयोगी और उसके प्रतिद्वंद्वी, उसके साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से देखेंगे?

और क्या घरेलू राजनीति में कमज़ोर पड़ते ट्रंप के साथ ही दुनिया के प्रति अमेरिका का रवैया भी बदल सकता है?

इन सवालों पर कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने बात की वॉशिंगटन स्थित पत्रकार इरम अब्बासी, लंदन में पत्रकार ज़ुबैर अहमद और अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत अरुण कुमार से.

वीडियो कैप्शन, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद क्या ट्रंप कमज़ोर पड़ जाएंगे? - द लेंस

मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद अमेरिका में कैसा है माहौल?

वॉशिंगटन स्थित पत्रकार इरम अब्बासी ने कहा, "ट्रंप प्रशासन में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा रहा. आप तमाम विश्लेषण और चुनावी सर्वेक्षण देख लें, यहां तक कि मतदाताओं से मेरी खुद की बातचीत में भी भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दे के तौर पर सामने आया."

उन्होंने आगे बताया कि इसराइल को अमेरिका का समर्थन भी इन चुनावों में एक बड़ा मुद्दा रहा. इसराइल को अमेरिकी समर्थन और उसे दी जाने वाली आर्थिक मदद को लेकर मतदाताओं के बीच जिस तरह की चर्चा और असहमति देखने को मिली, वैसी अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में पहले शायद ही कभी देखने को मिली थी.

उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी खुलेआम कहा कि हम इसलिए हारे क्योंकि ईरान की जंग और महंगाई की वजह से लोगों ने उनको वोट नहीं दिया. मौजूदा हाउस स्पीकर और इस पद पर जनवरी तक बने रहने वाले माइक जॉनसन ने भी कहा है कि आगे वो किसी भी हाउस की रेस में हिस्सा नहीं लेंगे.

चुनाव से पहले भी कई रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने इमिग्रेशन और ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप की नीतियों से दूरी बनाई.

अमेरिकी मीडिया में इन नतीजों को किस तरह देखा जा रहा है?

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इस सवाल के जवाब में अब्बासी कहती हैं, "यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस मीडिया संस्थान को देख रहे हैं. ट्रंप को जैसे ही चुनावी नतीजे मिले, वह फ़ॉक्स न्यूज़ पर गए और उन्होंने चैनल को फटकार लगाई. उन्होंने आरोप लगाया कि चैनल की कवरेज और ग़लत आंकड़ों की वजह से चुनावी नतीजे उनके ख़िलाफ़ गए."

उन्होंने आगे बताया, "सीएनएन की बात करें तो उसने एसोसिएटेड प्रेस (एपी) से क़रीब एक घंटे पहले ही अपने दर्शकों को बता दिया था कि कांग्रेस के दोनों सदनों का नियंत्रण डेमोक्रेटिक पार्टी के पास जा रहा है. उस समय एपी ने अभी तक चुनावी मुक़ाबलों के नतीजों की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी. अगर आप उदारवादी या डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ झुकाव रखने वाले मीडिया संस्थानों को देखें, तो वहां इन नतीजों को लेकर ख़ुशी का माहौल है."

उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स और दूसरे बड़े समाचार संस्थानों की कवरेज देखें, तो वहां एक अलग तरह की चर्चा है. पिछले दो साल में ट्रंप ने वॉशिंगटन और पूरे अमेरिका में जिस तरह का राजनीतिक माहौल बनाया था, उसके मुक़ाबले उदारवादी रुझान वाले कई अख़बारों में अब उम्मीद दिखाई दे रही है. विश्लेषणों में इस बात को भी रेखांकित किया जा रहा है कि अमेरिका में अपनी राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने और ग़लतियों को ठीक करने की क्षमता मौजूद है.

ट्रंप की हार का वैश्विक स्तर पर क्या असर होगा?

ट्रंप

इन नतीजों के बाद वैश्विक स्तर पर क्या राष्ट्रपति ट्रंप के निर्णय लेने की क्षमता पर असर पड़ेगा?

इस सवाल के जवाब में लंदन स्थित पत्रकार ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "जो चुनावी नतीजे आए हैं, उनका साफ़ मतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी ने कांग्रेस में अपना बहुमत खो दिया है. इसकी वजह से राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अगले दो साल मुश्किल हो सकते हैं. राजनीतिक भाषा में कहें तो अब वह एक तरह से 'सिटिंग डक' की स्थिति में होंगे, यानी उनकी ताक़त और फ़ैसले लेने की क्षमता पहले जैसी नहीं रहेगी. हालांकि, यह बात मुख्य रूप से घरेलू नीतियों के संदर्भ में ज़्यादा सही है."

"जहां तक विदेश नीति का सवाल है, वहां राष्ट्रपति के पास अब भी काफ़ी अधिकार और फ़ैसले लेने की शक्ति है. मसलन, टैरिफ़ की बात करें तो ट्रंप अब तक अपनी मर्ज़ी से दूसरे देशों पर टैरिफ़ लगाते आए हैं. भारत पर भी उन्होंने अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ टैरिफ़ लगाए हैं."

वो आगे कहते हैं कि अभी की स्थिति में अगर राष्ट्रपति कल को ईरान के ख़िलाफ़ दोबारा युद्ध छेड़ना चाहें या उस पर हमला करना चाहें, तो उन्हें ऐसा करने से रोकने की सीधी शक्ति कांग्रेस के पास नहीं है.

यह ज़रूर है कि आने वाले दिनों में अगर अमेरिका को युद्ध जारी रखना है, तो उसके लिए पैसे की ज़रूरत होगी और इसके लिए प्रशासन को कांग्रेस के पास जाना पड़ेगा.

अब चूंकि कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत खो चुकी है, इसलिए ट्रंप प्रशासन को विधेयक और बजट पारित कराने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में लंबे समय तक युद्ध जारी रखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

क्योंकि जो नए चुने हुए प्रतिनिधि हैं, ये 3 जनवरी को शपथ लेंगे. और इसके बाद कांग्रेस में बहुमत डेमोक्रेट्स के पास होगी.

इसके अलावा, सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में चुनकर आए सात ऐसे सांसद भी हैं जो फलस्तीन के समर्थक हैं. उन्होंने युद्ध और इसराइल को लेकर अमेरिका की नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए यह चुनाव जीता है.

इसका मतलब है कि जनता ने उनका समर्थन किया है और उन्हें चुनकर संसद में भेजा है.

अब वे कांग्रेस और उसके दोनों सदनों में यह सवाल उठा सकते हैं कि इसराइल को हर साल दी जाने वाली चार अरब डॉलर की सैन्य सहायता क्यों जारी रखी जाए? इस सहायता को बंद किया जाए और इसराइल पर अंकुश लगाया जाए.

ऐसे में ग़ज़ा में जारी युद्ध को लेकर अमेरिकी नीति पर भी दबाव बन सकता है.

हालांकि, वो ये भी कहते हैं कि उनके अनुसार ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद जब डेमोक्रेटिक पार्टी से आने वाले जो बाइडन राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने इसराइल का और मज़बूती से साथ दिया. तो भले ही कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की बढ़त रहेगी, फिर भी इसराइल को लेकर बड़ा बदलाव आए, ऐसा नहीं लगता है.

वॉशिंगटन स्थित पत्रकार इरम अब्बासी के मुताबिक़, ट्रंप के समर्थकों ने आरोप लगाया कि वह महंगाई के लिए यूक्रेन युद्ध को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. साथ ही, वे यह भी नहीं चाहते कि यूक्रेन में युद्ध जारी रहे और अमेरिका उसे अपना समर्थन देता रहे.

इस पर बात करते हुए ज़ुबैर अहमद कहते हैं कि अमेरिका की ओर से पिछले डेढ़ साल से यूक्रेन पर रूस के साथ समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन यूक्रेन इसके लिए तैयार नहीं है. उनका मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद अमेरिका की ओर से यूक्रेन पर युद्ध ख़त्म कर रूस के साथ समझौता करने का दबाव और बढ़ सकता है.

भारत पर इन नतीजों का क्या असर होगा?

मिडटर्म में ट्रंप की हार का असर

अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत अरुण कुमार कहते हैं, "मेरे ख़्याल से ज़्यादा कुछ नहीं बदलेगा, क्योंकि राष्ट्रपति तो ट्रंप ही हैं. अमेरिका की व्यवस्था में विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रपति के पास काफ़ी अधिकार और फ़ैसले लेने की स्वतंत्रता होती है."

"इन मामलों में उन्हें कांग्रेस की राय या अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं होती. इसलिए व्यापार और एच-1बी वीज़ा जैसे हमारे मुद्दों पर फ़ैसला राष्ट्रपति ही करेंगे. इस लिहाज से फ़िलहाल इन चुनावी नतीजों का सीधा असर नहीं पड़ेगा."

वो आगे कहते हैं कि हमें यह देखना होगा कि रिपब्लिकन पार्टी की हार को राष्ट्रपति ट्रंप किस रूप में लेते हैं. इसे उनकी व्यक्तिगत हार भी माना जा सकता है. ऐसे में वह इन नतीजों से क्या संदेश लेते हैं? क्या उन्हें अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए या कुछ नरमी बरतनी चाहिए?

भारत और अमेरिका के रिश्तों का एक बहुत अहम पहलू इस समय दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता है. अगर इन चुनावी नतीजों को व्यापार वार्ता के संदर्भ में देखें, तो क्या इस पर कोई असर पड़ेगा?

क्या अब कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण को देखते हुए राष्ट्रपति ट्रंप को व्यापार वार्ता में थोड़ा ज़्यादा सावधान रहना पड़ेगा?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं कि इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिस व्यापार समझौते पर बातचीत हो रही है, उस पर राष्ट्रपति खुद फ़ैसला ले सकते हैं. इसके लिए उन्हें कांग्रेस की सहमति की ज़रूरत नहीं है.

अगर कोई संधि होती, तो उन्हें कांग्रेस के पास जाना पड़ता. लेकिन जिस तरह का व्यापार समझौता अभी चर्चा में है, उसके लिए कांग्रेस की मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है.

दूसरी बात यह है कि अगर राष्ट्रपति ट्रंप को चुनाव में कोई झटका लगा है, तो हो सकता है कि वह विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ सफलताएं दिखाने की कोशिश करें.

वो कहते हैं, "ऐसे में अगर वह भारत के साथ व्यापार समझौता जल्दी कर लेते हैं, तो इसे अपनी एक सफलता के तौर पर पेश कर सकते हैं. इसलिए मेरे ख़्याल से फ़िलहाल व्यापार समझौते पर इन नतीजों का कोई नकारात्मक असर पड़ने की संभावना नहीं है."

राष्ट्रपति ट्रंप को कई मायनों में अप्रत्याशित फ़ैसले लेने वाला माना जाता है, तो क्या ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को लेकर उनकी नीति में कोई बदलाव आएगा? इसका आर्थिक असर पूरी दुनिया और भारत पर भी पड़ता है. इसी से जुड़ा एक और सवाल है. ऊर्जा और ईंधन की आपूर्ति से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर भी क्या इन चुनावी नतीजों का कोई बड़ा असर हो सकता है?

इस पर अरुण कुमार कहते हैं, "इस पर हमें ध्यान से नज़र रखनी होगी. कई लोगों ने कहा है कि फ़रवरी से ईरान के साथ चल रहे युद्ध का चुनाव में राष्ट्रपति ट्रंप पर नकारात्मक असर पड़ा है. आपने देखा होगा कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कल एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने माना कि ईरान युद्ध का अमेरिका पर नकारात्मक असर हुआ है."

"ऐसे में अगर राष्ट्रपति ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखकर सोच रहे हैं, तो उन्हें यह तय करना होगा कि युद्ध को लेकर आगे क्या किया जाए. फ़िलहाल युद्ध बहुत सक्रिय चरण में नहीं है. ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि वह किसी कूटनीतिक और राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे."

वो आगे कहते हैं, "अगर हम अतीत को देखें, तो वियतनाम युद्ध में अमेरिका सफल नहीं रहा. वर्ष 2003 में जॉर्ज बुश ने इराक युद्ध शुरू किया, वहां भी अमेरिका सफल नहीं रहा. अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल रहने के बाद भी अमेरिका को वहां से निकलना पड़ा."

"2001 में अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से हटाया था, लेकिन 2021 में तालिबान फिर सत्ता में लौट आए. इसलिए युद्ध हर समस्या का समाधान नहीं है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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