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महाराष्ट्र के विशालगढ़ में अतिक्रमण हटाने के नाम पर हुई हिंसा के बाद पीड़ितों ने क्या बताया: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, प्राची कुलकर्णी
- पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में विशालगढ़ क़िले के आस-पास के इलाकों में अतिक्रमण हटाने के लिए 14 जुलाई को शिवाजी के वंशज संभाजी राजे छत्रपति की अपील पर कई कार्यकर्ता पहुंचे थे.
आरोप है कि उन लोगों ने गजपुर गांव में करीब तीन दर्जन से ज़्यादा घरों को नुक़सान पहुंचाया. हिंसा की चपेट में आए परिवार वालों को कहना है कि ये हिंसा जब हो रही थी तब पुलिस वहां मौजूद थी.
इस हिंसा के बाद पुलिस ने संभाजी राजे छत्रपति के ख़िलाफ़ सभा निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने का मामला दर्ज किया गया है. इसके अलावा पुलिस ने 400 से 500 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया है.
हालांकि इस पूरी हिंसा को लेकर दावा किया जा रहा है कि एक ख़ास समुदाय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया.
हिंसा क्यों भड़की, हिंसा को रोकने के लिए क्या व्यवस्था थी, मार्च के दौरान पुलिस ने क्या कुछ किया, इन सब सवालों के जवाब के लिए बीबीसी मराठी ने ज़िला प्रशासन और पुलिस से कई बार संपर्क किया लेकिन किसी की ओर से इन सवालों के जवाब नहीं मिले है.
हिंसा में कितना नुक़सान हुआ
हिंसा के बाद इलाके में व्याप्त तनाव को देखते हुए पुलिस ने घटना स्थल से 20 किलोमीटर पहले ही पूरे क्षेत्र को सील कर दिया है.
इस पूरे मामले पर राज्य के गृह मंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कहा है, "प्रत्येक शिव भक्त की मांग थी कि अतिक्रमण हटाया जाना चाहिए. बेशक, सरकार का मानना है कि इसे क़ानून के ज़रिए तोड़ा जाना चाहिए. सरकार की ओर से हटाने की कार्रवाई की जा रही है. लेकिन हमारी प्राथमिकता है कि इलाके में शांति कैसे स्थापित की जाए."
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, इस हिंसा के दौरान क़रीब दो करोड़ 85 लाख रुपये की संपत्ति नष्ट हुई है.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए तैय्यब अली नाइक ने कहा, "देख देख के टारगेट किया गया. वे नाम लेकर दुकानें और मकान तोड़ रहे थे. हमारे गांव में ऐसा कोई माहौल नहीं था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. ये सभी लोग बाहर से आए थे."
इस हिंसा में रेशमा प्रभुलकर के घर और दुकान में भी आग लगा दी गई थी. वे बताती हैं, "हमें पता था कि संगठन के लोग आ रहे हैं. पुलिस ने हमें घर पर रहने और दुकानें न खोलने के लिए कहा था. हमने उन्हें आश्रय दिया, सहयोग किया. उस दिन बारिश हो रही थी इसलिए हमने उन्हें रेनकोट दिए. फिर वे वापस आए और हमारे घरों पर हमला कर दिया."
विशालगढ़ क्षेत्र में वास्तव में क्या हुआ था?
रेशमा प्रभुलकर ने कहा, "श्रीराम कहो. हमने कहा, 'राम भी हमारे हैं और अली भी हमारे हैं.' हम भेदभाव नहीं करते."
रेशमा और उनकी सास कपड़े और चूड़ियों की दुकान चलाती थीं. जब हमला हुआ तब दोनों अपने बच्चों के साथ घर पर थे. उनका कहना है कि हमलावर इतने आक्रामक थे कि वह अपने बच्चों के साथ जान बचाने के लिए पास के जंगल में भाग गईं.
प्रभुलकर की जली हुई दुकान के बगल में तैय्यब अली का छोटा सा होटल है. गजापुर में सभी की स्थिति प्रभुकर और तैय्यब अली जैसी ही है. सभी की आंखों में आंसू और चेहरे पर एक ही सवाल है कि उनका गुनाह क्या था?
अतिक्रमण हटाने के नाम पर तीन दर्जन से ज़्यादा घरों में तोड़फोड़ की गई. लेकिन, स्थानीय निवासी और पूर्व सरपंच संजय पाटिल का कहना है कि उन्होंने ग्राम सभा के ज़रिए इन लोगों को वैध तरीक़े से ज़मीन दिलाई थी.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं विशालगढ़ में एक होटल व्यवसाय चला रहा था. इन लोगों के पास कुछ नहीं था. जब मैं सरपंच के रूप में काम कर रहा था, तो लोग पूरी तरह से निराश्रित थे. ऐसे में ग्राम पंचायत ने इन लोगों को व्यवसाय चलाने के लिए ज़मीन दी."
हिंदुत्व संगठनों की भूमिका
दरअसल विशालगढ़ पर अतिक्रमण का विवाद पुराना है. लेकिन ये अतिक्रमण क्यों नहीं हटाए जाते, इस पर सवाल उठाते हुए संभाजी राजे छत्रपति ने 'चलो विशालगढ़' अभियान की घोषणा की थी.
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि संभाजी राजे के पहुंचने से पहले ही यहां तोड़फोड़ शुरू हो गई थी.
घटना स्थल पर मौजूद युवा पत्रकार बालासाहेब उबले हिंसा की घटना के बारे में बीबीसी मराठी से कहा, "संभाजी राजे घोषणा के मुताबिक़ आए थे. वह करीब 1:30 बजे वहां पहुंचे और आंदोलन शुरू करते हुए क़िले के इलाके में बढ़े थे. उस समय एक गुस्साई भीड़ क़िले में तोड़फोड़ कर रही थी."
कोल्हापुर में कई हिंदू संगठन कई वर्षों से इन अतिक्रमणों का मुद्दा उठाते रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि संभाजी राजे छत्रपति को उनका समर्थन नहीं है.
'अतिक्रमण नहीं एक समुदाय पर निशाना'
बीबीसी मराठी से बात करते हुए विश्व हिंदू परिषद के कुंदन पाटिल ने कहा, "अतिक्रमण को क़ानूनी माध्यमों से हटाया जाना था. मंत्री ने 11 जुलाई को बैठक की. 12 जुलाई को उन्होंने महाधिवक्ता से चर्चा की."
"इसके बाद संभाजी वहां जा रहे थे. अब तक 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. प्रशासन ने अब तक कार्रवाई नहीं की थी. क्या अतिक्रमण हटाते समय इतनी हिंसा की ज़रूरत थी? ये हमारे लोग नहीं थे. वे 8-10 लोग थे जो प्रशासन से लड़ना चाहते थे."
कुंदन पाटिल का दावा है, "दरगाह और मस्जिद के निर्माण सहित 136 अनधिकृत निर्माण हैं. हमारी मांग है कि अनधिकृत निर्माण को हटाया जाना चाहिए."
वैसे मुस्लिम संगठनों ने भी अतिक्रमण हटाने का समर्थन किया है.
मोहम्मडन एजुकेशन सोसायटी के चेयरमैन गनी अजरेकर ने कहा, "हमने संभाजी राजे छत्रपति को बताया था कि यहां दंगा हो सकता है. दरगाह और मस्जिद छत्रपति शिवाजी महाराज के समय की है, तब से इसका संरक्षण किया जा रहा है. संभाजी राजे ने कहा था कि मस्जिद के 156 अतिक्रमणों को हटाया जाना चाहिए."
शाहू महाराज बनाम संभाजी राजे
इस मामले में कोल्हापुर के मौजूदा सांसद छत्रपति शाहू महाराज और पूर्व सांसद संभाजी राजे छत्रपति के बीच पिता-पुत्र का टकराव भी देखने को मिल रहा है.
घटना के दूसरे दिन गिरफ़्तार शिव भक्तों के समर्थन में साहू थाने भी पहुंचे और कहा कि वे शिवभक्तों के साथ हैं. उन्होंने मांग की कि अगर केस दर्ज हुआ है तो मुझे गिरफ़्तार किया जाए.
पत्रकारों के घटनास्थल पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. जब तोड़फोड़ हुई तो कोल्हापुर के पत्रकार वहां गए थे.
हालांकि घटना के बाद दो दिनों तक पत्रकारों को लगभग 20 किलोमीटर दूर ही रोका जाता रहा. न सिर्फ पत्रकारों बल्कि मदद लेकर निकल रहे छत्रपति शाहू महाराज और सतेज पाटिल को भी पुलिस ने रोका और उसके बाद सिर्फ़ 15 लोगों को जाने की इजाज़त दी गई.
हिंसा के बाद शाहू महाराज ने क्या कहा
कोल्हापुर के सांसद और संभाजी राजे के पिता छत्रपति शाहू महाराज ने घटना की निंदा की है.
उन्होंने एक पत्र जारी करके कहा, ''विशालगढ़ में अतिक्रमण हटाने के अवसर पर जो हिंसा हुई, उससे हमारे मन को बहुत पीड़ा हो रही है. यह दुखद है कि ऐसी घटना राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज के कोल्हापुर में घटी. इस अतिक्रमण को हटाने के लिए संभाजी राज ने आक्रामक रुख अपनाया. लेकिन उनके आक्रामक रुख के कारण हिंसा हुई, इससे हम सहमत नहीं हैं."
इस घटना के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए शाहू महाराज ने कहा, “विशालगढ़ मामले को गंभीरता से लेने और पूर्व सांसद संभाजी राजे और मुख्यमंत्री के बीच चर्चा कराने के निर्देश कलेक्टर और पुलिस प्रमुख को दिए गए. लेकिन, राज्य सरकार, प्रशासन और पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित सावधानी नहीं बरती. यह ज़िला प्रशासन व पुलिस की विफलता है. सरकार ने अतिक्रमण हटाने का जो आदेश रविवार को दिया, अगर वह पहले ही दे देती तो यह घटना नहीं होती.”
शाहू महराज ने यह भी मांग की कि प्रशासन को बिना किसी नुकसान के विशालगढ़ पर अतिक्रमण हटाने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए.