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नज़रिया: मोदी कैसे पड़ गए 'आप' पर भारी
- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
एमसीडी के चुनाव परिणामों को दो तरीके से देख सकते हैं. यह मोदी की जीत है और दूसरे अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की हार.
आंशिक रूप से दोनों बातें सही हैं. फिर भी देखना होगा कि दोनों में से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्या है.
कई विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी को काम की वजह से नहीं, 'मोदी के जादू' की वजह से जीत मिली.
पर इस जादू ने साल 2015 के विधानसभा चुनाव में काम नहीं किया, जबकि मोदी की अपील उस वक्त आज से कम नहीं थी.
उस वक्त अरविंद केजरीवाल की 'नई राजनीति' मोदी के जादू पर भारी पड़ी थी. आज मोदी का जादू भारी पड़ा है.
वोटर का मोहभंग
इसका मतलब है कि केजरीवाल का जादू दो साल में रफा-दफा हो गया और मोदी का जादू कायम है.
आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है. साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी.
जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है. दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है.
'आप' इसके लिए ईवीएम को दोष दे रही है, पर यह बात गले नहीं उतरती. आखिर 2015 के चुनाव में भी तो ईवीएम मशीनें थीं.
लगता है कि पार्टी इसे मुद्दा बनाएगी. देखना होगा कि उसकी यह कोशिश उसे कहीं और ज्यादा अलोकप्रिय न बना दे.
'ईवीएम में गड़बड़ी'
मतदान के दो-तीन दिन पहले अखबारों में प्रकाशित इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा था, "ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई तो हमें 272 में 200 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी."
केजरीवाल की बातों में यकीन नहीं बोल रहा है. पंजाब और गोवा में मिली हार से उनका मनोबल पहले से ही टूटा हुआ है.
एमसीडी की हार अब पार्टी के भीतर की कसमसाहट को बढ़ाएगी.
परिणाम आने के एक दिन पहले सोशल मीडिया पर केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था.
इसमें उन्होंने कहा, "अब अगर हम बुधवार को हारते हैं... नतीजे वैसे ही रहते हैं जैसे कि बीती रात बताए गए हैं, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे... आम आदमी पार्टी आंदोलन की उपज है, इसलिए पार्टी वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने से हिचकिचाएगी नहीं."
राष्ट्रीय राजनीति
पार्टी जिस स्वच्छ छवि और 'नैतिक आभा मंडल' के साथ दिल्ली में जीतकर आई थी, वही उसपर भारी पड़ा.
नैतिकता और शुचिता की जो अपेक्षाएं वोटर ने उससे रखीं, वो पूरी नहीं हो पाईं.
उसका दिल्ली से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से हस्तक्षेप करना भी बचकाना साबित हुआ. अब वे किसकी ईंट से ईंट बजाएंगे?
वोटर उसे अलग रंगो-रूप की पार्टी मानकर चल रहा था. उसका मोहभंग हुआ है.
फिलहाल यह मान लेना भी अनुचित होगा कि उसका वजूद खत्म हो जाएगा, पर निश्चित रूप से उसके सिर पर संकट के बादल हैं.
विधानसभा चुनाव
केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने हाल में रजौरी गार्डन क्षेत्र में प्रचार के दौरान कहा था कि दिल्ली में अगले छह महीने में विधानसभा चुनाव होंगे.
पार्टी के बहुमत को देखते हुए यह बात अटपटी लगती है, पर कौन जाने भीतर क्या पक रहा है.
एमसीडी चुनाव में बीजेपी ने दिल्ली के नेतृत्व में बदलाव और पुराने पार्षदों को टिकट नहीं देने की रणनीति अपनाई.
दिल्ली के निवासियों के मन में अपने पार्षदों के प्रति जो नाराजगी थी, वह इस तरह से निकल गई.
चूंकि उसके सभी प्रत्याशी नए थे, इसलिए 'नएपन' की रणनीति ने भी काम किया.
नगर निगम
उत्तर प्रदेश में हाल में मिली जीत ने उसके कार्यकर्ताओं के उत्साह को बढ़ाया. ऐसे कई फैक्टर मिलकर काम करते हैं.
बीजेपी ने शहर की साज-सफाई, कूड़े के ढेर और नगर निगम के दफ्तरों में भ्रष्टाचार पर से ध्यान हटाकर वोटर को राजनीति के ज़्यादा बड़े सवालों से जोड़ा.
इसमें मोदी के नाम ने काम किया. वस्तुतः यह चुनाव नगरपालिका के चुनाव जैसा लगा ही नहीं. इसके सारे निहितार्थ राष्ट्रीय हैं.
मुकाबला त्रिकोणीय होना बीजेपी के हक में गया. बीजेपी के विरोधी वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बँटे.
इस तिकोने संग्राम में बीएसपी और जेडीयू जैसी पार्टियाँ लगभग गायब हो गईं.
रजौरी गार्डन में कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी के दूसरे नम्बर पर रहने के बाद उम्मीद थी कि वह एमसीडी में भी शायद दूसरे नम्बर पर रहे.
'इन्द्रधनुषी गठबंधन'
इससे उसकी वापसी के आसार बनते, फिलहाल ऐसा हुआ नहीं है. दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के भीतर मनमुटाव इस बीच बढ़ा ही है.
इस पराजय के दूरगामी परिणाम होंगे. बहरहाल अजय माकन ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है.
यह मोदी सरकार की परीक्षा की घड़ी भी है. उसे मिली भारी सफलता वोटर की 'बढ़ती अपेक्षाओं' को बता रही है.
मोदी सरकार के विरोधी अब एकजुट भी होंगे. राष्ट्रीय स्तर पर 'इन्द्रधनुषी गठबंधन' की बातें होने लगी हैं. कांग्रेस के पास अब यह आखिरी विकल्प है.
इस जीत के साथ बीजेपी की जिम्मेदारी बढ़ गई है. यह जीत न तो अंतिम है और न निर्णायक.
भाजपा को सुनिश्चित करना होगा कि जिस तरह आम आदमी पार्टी को लेकर जनता की उम्मीदें टूटीं वैसा ही उसके साथ न होने पाए.
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